विवाहक द्वितीय दिन — गौरी पूजन, मौहक, ढकनछोरी
संस्कृति· 16 min

Wedding Second DayGauri Puja, Mauhak and Dhakanchori

विवाह का दूसरा दिन — गौरी पूजन, मौहक, ढकनछोरी

खुशी मिश्रा·23 Jun 2026

Four days of sweet food, Gauri puja, hair unbraiding, Mauhak feast, Dhakanchori — the second day in the Kohbar chamber.

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मिथिला विवाह श्रृंखला

मिथिला विवाह केवल एक दिनक समारोह नहि, बल्कि अनेक दिन धरि चलनिहार धार्मिक, सांस्कृतिक आ पारिवारिक संस्कारक सुन्दर समन्वय थिक। विवाहक पहिल दिनक प्रमुख रस्म—परिछन, देहरी छेकन, कोहबर प्रवेश, नैनाजोगिन आ ओठंगर कूटना—सम्पन्न भेला पश्चात् द्वितीय दिन नव दम्पतीक जीवनमे नव अध्यायक आरम्भ मानल जाइत अछि।

ई दिन विशेष रूपसँ कोहबर घरमे विविध धार्मिक आ पारिवारिक रस्म सम्पन्न होइत अछि। एहि दिनक प्रमुख आकर्षण गौरी पूजन, मौहक आ ढकनछोरी थिक, जाहिमे श्रद्धा, हास्य, प्रेम आ पारिवारिक आत्मीयताक अद्भुत संगम देखल जाइत अछि।

चारि दिनक नियम#

मिथिलाक परम्परानुसार विवाहक पश्चात् वर, वधू आ विधकारी (मुख्य पुरोहित) चारि दिन धरि विशेष नियमक पालन करैत छथि।

एहि अवधिमे—

  • ◆केवल मीठ भोजन ग्रहण कएल जाइत अछि।
  • ◆नमकयुक्त भोजन वर्जित मानल जाइत अछि।
  • ◆स्नान नहि कएल जाइत अछि।
  • ◆संयम, सादगी आ पवित्रताक पालन कएल जाइत अछि।

ई नियम नव दाम्पत्य जीवनक प्रारम्भमे आत्मसंयम, शुद्धता आ धार्मिक अनुशासनक प्रतीक मानल जाइत अछि।

गौरी पूजन#

द्वितीय दिनक सर्वाधिक महत्वपूर्ण धार्मिक रस्म गौरी पूजन थिक।

माता पार्वती (गौरी) अखण्ड सौभाग्य, प्रेम, समृद्धि आ सुखी वैवाहिक जीवनक प्रतीक मानल जाइ छथि। नववधू अपन पतिक संग मिलि माता गौरीक पूजा करैत छथि आ सुखमय गृहस्थ जीवनक कामना करैत छथि।

पूजामे सामान्यतः—

  • ◆फूल
  • ◆अक्षत
  • ◆दूब
  • ◆पान
  • ◆सुपारी
  • ◆दीप
  • ◆धूप
  • ◆नैवेद्य

आदि सामग्रीक प्रयोग होइत अछि।

लोकविश्वास अछि जे माता गौरीक कृपासँ दाम्पत्य जीवनमे प्रेम, सम्मान आ सौभाग्यक वृद्धि होइत अछि।

चोटी खोलबाक रस्म#

गौरी पूजनक उपरान्त वर नववधूक चोटी खोलैत छथि। ई रस्म नव जीवनक प्रारम्भ, अपनत्व आ परस्पर विश्वासक प्रतीक मानल जाइत अछि।

एहि अवसरपर महिलासभ मंगलगीत गबैत छथि आ हास्य-विनोदक वातावरण बनल रहैत अछि।

मुट्ठी खोलबाक रस्म#

एहि रस्ममे वधू अपन हाथक मुट्ठी बन्द करैत छथि। वर बायाँ हाथसँ तीन बेर ओहि मुट्ठीकेँ खोलबाक प्रयास करैत छथि।

ई रस्म दाम्पत्य जीवनमे प्रेम, धैर्य, समझदारी आ परस्पर सहयोगक प्रतीक मानल जाइत अछि। परिवारक लोक एहि अवसरपर हँसी-मजाक आ गीतक माध्यमसँ उत्सवक आनन्द लैत छथि।

मौहक#

मौहक

मौहक मिथिला विवाहक एक महत्वपूर्ण पारिवारिक परम्परा थिक। एहि अवसरपर नवदम्पतीक लेल विशेष रूपसँ मीठ भोजन परोसल जाइत अछि।

सामान्यतः भोजनमे—

  • ◆खीर
  • ◆पुरी
  • ◆मिठाइ
  • ◆दही
  • ◆फल
  • ◆पारम्परिक पकवान

सम्मिलित रहैत अछि।

मौहक केवल भोजन नहि, बल्कि नवदम्पतीक प्रति परिवारक स्नेह, आदर आ मंगलकामनाक प्रतीक थिक।

ढकनछोरी#

ढकनछोरी

ढकनछोरी मिथिलाक विवाह परम्पराक अत्यन्त मनोरञ्जक रस्मसभमे सँ एक अछि। एहि रस्ममे महिलासभ आ सालीसभ हँसी-परिहासक माध्यमसँ वरकेँ विभिन्न प्रकारेँ उलझबैत छथि।

ढकन अथवा अन्य वस्तु नुकाकऽ वरसँ खोजबाक आग्रह कएल जाइत अछि। एहि दौरान हँसी-मजाक, गीत आ परिहासक वातावरण बनल रहैत अछि।

ई रस्म नव सम्बन्धमे आत्मीयता, अपनत्व आ पारिवारिक निकटताकेँ बढ़ाबयमे सहायक मानल जाइत अछि।

दौर्बाक्षत आ चुमावन#

द्वितीय दिनक अन्तमे परिवारक ज्येष्ठ सदस्य नवदम्पतीकेँ फेरसँ दौर्बाक्षत आ चुमावन करैत छथि।

  • ◆दूब
  • ◆अक्षत
  • ◆आशीर्वाद
  • ◆मंगलकामना

द्वारा नवदम्पतीक सुखी जीवनक कामना कएल जाइत अछि।

ई रस्म परिवारक स्नेह, संरक्षण आ आशीर्वादक प्रतीक थिक।

चतुर्थी धरि चलनिहार परम्परा#

विवाहक पश्चात् ई समस्त नियम आ अनेक रस्म चतुर्थी संस्कार धरि चलैत रहैत अछि। एहि अवधिमे नवदम्पती परिवारक बीच समय बितबैत छथि आ धीरे-धीरे नव जीवनमे प्रवेश करैत छथि।

सांस्कृतिक महत्त्व#

विवाहक द्वितीय दिनक ई रस्मसभ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि पारिवारिक आत्मीयता, हास्य, प्रेम, संयम आ लोकसंस्कृतिक अमूल्य धरोहर थिक।

एहि रस्मसभक माध्यमसँ नवदम्पतीक सम्बन्ध केवल पति-पत्नी धरि सीमित नहि रहि सम्पूर्ण परिवारक संग भावनात्मक रूपसँ जुड़ैत अछि।

मिथिलामे प्रचलन#

विवाहक द्वितीय दिन मिथिलाक ग्रामीण आ शहरी दुनू वातावरणमे अलग-अलग रूपमे देखल जा सकैत अछि। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सहरसा — प्रत्येक जिलामे स्थानीय रीति-रिवाजक संगम होइत अछि।

सांस्कृतिक महत्व#

विवाहक द्वितीय दिन मिथिलाक सांस्कृतिक पहचान, लोकआस्था, आ सामाजिक जीवनक अभिन्न अंग अछि। ई केवल इतिहासक विषय नहि — आजहियो जीवित अनुभव अछि जे परिवार, गाम, आ समुदायक बीच साझा होइत अछि।

लोकजीवनसँ जुड़ाव#

मिथिलाक लोकगीत, लोककथा, आ दैनिक जीवनमे विवाहक द्वितीय दिनक गहरा प्रभाव देखल जा सकैत अछि। बुजुर्ग कहानी सुनाबैत छथि, महिला गीत गाबैत छथि, आ बच्चा संस्कार सिखैत अछि — ई मौखिक परंपरा संस्कृतिक निरंतरताक मुख्य साधन अछि।

आधुनिक संदर्भ#

आज विवाहक द्वितीय दिनक विषयपर पुस्तक, लेख, डॉक्यूमेंट्री, आ digital content निर्माण हो रहल अछि। MithilaDwaar जेकाँ पहल — मैथिली, हिंदी, आ अंग्रेजीमे ज्ञान पहुँचाबैत अछि।

संरक्षणक दायित्व#

नव पीढ़ीक लेल विवाहक द्वितीय दिनक ज्ञान संरक्षित करब — हम सभक साझा जिम्मेदारी अछि। स्कूल, परिवार, सांस्कृतिक संस्था — तीनू मिलि परंपरा जीवित राखि सकैत अछि।

विरासत आ भविष्य#

विवाहक द्वितीय दिन मिथिलाक सांस्कृतिक पहचानक अभिन्न अंग अछि। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सहरसा आ जनकपुर — सभ क्षेत्रमे ई परंपरा अलग-अलग रूपमे जीवित अछि। ग्रामीण मेला, पारिवारिक संस्कार, आ सामूहिक उत्सव — एहि सभ स्थलपर एकर जीवंत रूप देखल जा सकैत अछि। मिथिलाक युवा पीढ़ी, डिजिटल माध्यम, आ सांस्कृतिक संस्थासभ मिलि एकर संरक्षणक नव रास्ता खोलि रहल अछि। विदेशमे बसल मैथिल समुदाय सेहो अपन माटि, भाषा, आ रीति-रिवाजसँ जुड़ल रहैत अछि।

निष्कर्ष#

गौरी पूजन, मौहक आ ढकनछोरी मिथिला विवाहक द्वितीय दिनकेँ विशेष बनबैत अछि। श्रद्धा, प्रेम, हास्य आ पारिवारिक स्नेहसँ भरल ई परम्परासभ मिथिलाक समृद्ध सांस्कृतिक विरासतकेँ जीवित रखने छथि।

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Originally published on MithilaDwaar · 23 June 2026 · Khushi Mishra

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Cite: Wedding Second Day — Gauri Puja, Mauhak and Dhakanchori — MithilaDwaar (https://www.mithiladwaar.com/blog/mithila-vivah-dvitiya-din)

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