मिथिलाक विवाह केवल दुइ परिवारक मिलन नहि — ई कई दिन धरि चलय वाला सांस्कृतिक उत्सव अछि। पूर्ण भारतमे मिथिलाक विवाह सबसँ विस्तृत आ विशिष्ट मानल जाइत अछि।
प्रमुख रीतियाँ (संक्षेप)#
मड़वा-गड़ाइ · हल्दी · बरियाती · सप्तपदी · सिंदूरदान · विदाई
मिथिलाक विवाह परम्परा मे "सिद्धान्त" सबसँ पहिल आ सबसँ महत्वपूर्ण चरण होइत अछि। ई ओ समय होइत अछि जखन दू परिवार विवाह लेल अपन सहमति दैत छथि आ सम्बन्ध केँ आधिकारिक रूप सँ स्वीकार करैत छथि।
सिद्धान्त केवल एक सामान्य सहमति नहि होइत अछि, बल्कि पूरा विवाह प्रक्रिया के आरम्भ मानल जाइत अछि। एहि चरण मे परिवार बहुत सोच-विचार कऽ कऽ निर्णय करैत छथि, कारण ई सम्बन्ध जीवन भरक लेल मानल जाइत अछि।
सिद्धान्त होयबाक बाद परिवारक बीच खुशीक माहौल बनि जाइत अछि। घर-परिवार मे विवाहक चर्चा शुरू भऽ जाइत अछि आ धीरे-धीरे पूरा तैयारी आरम्भ होइत अछि। रिश्तेदार, पड़ोसी आ अपन-पराय सबकेँ ई शुभ समाचार देल जाइत अछि। एहि समय मे महिलासभ गीत गाबय लगैत छथि, जे विवाहक शुभ आरम्भक प्रतीक होइत अछि।
सौराठ सभामिथिलाक ऐतिहासिक विवाह परम्परा#
सौराठ सभा मिथिलाक विवाह परम्पराक एक बहुत पुरान आ ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था छल, जे मधुबनी जिलाक सौराठ गाम मे आयोजित होइत छल। ई केवल एक गाम या सामान्य सभा नहि छल, बल्कि विवाह तय करबाक एक पूरा सामाजिक प्रणाली जेकाँ काम करैत छल।
अलग-अलग गाम सँ परिवार अपन योग्य वर केँ लऽ कऽ एहि सभा मे अबैत छलाह। कन्या पक्षक लोक सेहो एहि ठाम पहुँचैत छलाह, ताकि अपन बेटी लेल उचित वर चुनल जा सकय। ई एक प्रकारक खुला मंच छल, जतय कुल, गोत्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि आ सामाजिक स्थिति केँ देख कऽ निर्णय लेल जाइत छल।
पाञ्जीकार परिवारक वंशावली आ सात पीढ़ी धरि इतिहास राखैत छल। ओ वर आ कन्या पक्षक पूरा जानकारी मिलान करैत छल, ताकि कोनो पारिवारिक सम्बन्ध या निषेध न रहय। सौराठ सभा समाज केँ एक सूत्र मे जोड़बाक काम करैत छल — आजुओ मिथिलाक इतिहास मे ई एक अनोखा आ गौरवपूर्ण परम्परा याद कएल जाइत अछि।
गोत्र व्यवस्थामिथिलाक विवाहक मूल आधार#
मिथिलाक विवाह परम्परा मे गोत्र व्यवस्था सबसँ महत्वपूर्ण आ अनिवार्य नियम मानल जाइत अछि। विवाह तय करबाक समय सबसँ पहिने ई देखल जाइत अछि जे वर आ कन्या के गोत्र कोन अछि।
मानल जाइत अछि जे प्रत्येक गोत्र कोनो महान ऋषि सँ शुरू भेल अछि। एके गोत्र मे विवाह केँ अनुचित मानल जाइत अछि। गोत्र मिलान बिना विवाह प्रक्रिया आगे नहि बढ़ैत अछि — ई नियम समाज मे यह सुनिश्चित करैत अछि जे कोनो निकट सम्बन्ध मे विवाह नहि होय।
पाञ्जी मिलानसात पीढ़ी धरि पारिवारिक जांच#
गोत्र मिलानक बाद सबसँ महत्वपूर्ण चरण होइत अछि पाञ्जी मिलान। ईहि मे वर आ कन्या दुनू पक्षक परिवारक पिछला सात पीढ़ी मे कोनो सम्बन्ध त नहि अछि — ई देखल जाइत अछि।
पाञ्जीकार परिवारक वंशावली, गोत्र, कुल आ सम्बन्धक पूरा विवरण अपन पाञ्जी मे सुरक्षित रखैत छथि। यदि किछु भी सम्बन्ध या निषेध मिलैत अछि, त विवाह रोकल जा सकैत अछि। जँ सब किछु ठीक पाओल जाइत अछि, त विवाह केँ सामाजिक रूप सँ अनुमति भेट जाइत अछि।
विवाहक तैयारीमंडप, गीत आ पूर्व-विवाह वातावरण#
कन्यादान आ विवाहक सहमति तय भेला बाद पूरा घर विवाहक तैयारी मे जुटि जाइत अछि। मिथिलाक विवाह कई दिन धरि चलय वाला सांस्कृतिक उत्सव होइत अछि।
सबसँ पहिने विवाहक मंडप बाँस, केला गाछ, आमक पात आ फूल सँ सजाओल जाइत अछि — ई विवाहक पवित्र स्थल मानल जाइत अछि। महिलासभ समूह मे बैसि कऽ लोकगीत गाबय लगैत छथि। कन्या आ वरक वस्त्र, आभूषण आ अन्य सामग्री विशेष रूप सँ तैयार कएल जाइत अछि।
विवाहक दिनकन्याक सम्पूर्ण दिनचर्या#
विवाहक दिन कन्याक पूरा दिन विशेष परम्परागत नियम आ रस्मक बीच बितैत अछि। भोर मे स्नान — शारीरिक, मानसिक आ आध्यात्मिक शुद्धिक प्रतीक। स्नानक बाद नव विवाहक वस्त्र धारण।
एहि दिनक महत्वपूर्ण परम्परा — कन्या पूरा दिन खुले केश मे रहैत छथि, जे पुरान जीवन छोड़ि कऽ नव जीवनक प्रवेश द्वार पर छथि के प्रतीक अछि। दिन भरि महिलासभ गीत गाबैत छथि, ढोलक आ पारम्परिक गीतक संग ऊर्जा बनल रहैत अछि।
एहि दिन कन्याक पहिरल वस्त्र केँ बाद मे धोबीनी केँ देल जाइत अछि — मिथिलाक परम्परा अनुसार धोबीनी केँ सौभाग्य प्रदान करय वाली मानल जाइत अछि।
मातृका पूजाकुलदेवी आ कुलदेवता सँ आशीर्वाद#
विवाहक दिनक दोपहर मातृका पूजा एक बहुत महत्वपूर्ण आ पवित्र रस्म होइत अछि। कन्या अपन परिवारक कुलदेवी आ कुलदेवता के पूजा करैत छथि, ताकि नव जीवन सुख, शांति आ समृद्धि सँ भरल रहय।
फूल, चावल, दीप आ परम्परागत सामग्री अर्पित कएल जाइत अछि। मंत्रोच्चारणक बीच कन्या अपन भविष्यक वैवाहिक जीवन लेल आशीर्वाद मांगैत छथि। ई परिवारक आस्था, परम्परा आ संस्कृति केँ एक संग जोड़य वाला गहिरा क्षण होइत अछि।
प्रकृति पूजाआम आ महुआ गाछक परम्परा#
विवाहक दिनक आसपास कन्या बरात अएबाक पहिने आम आ महुआ गाछक पूजा करैत छथि। पिसल चाउर, लाल पवित्र सूत्र आ पारम्परिक सामग्री सँ गाछक चारू ओर पूजा कऽ कऽ आशीर्वाद मांगैत छथि।
आम आ महुआ गाछ मिथिलाक संस्कृति मे जीवन, समृद्धि आ प्रकृति सँ जुड़ल प्रतीक मानल जाइत अछि। ई परम्परा प्रकृति प्रति सम्मान आ गहिरा संबंध केँ दर्शबैत अछि।
बरात आगमनस्वागत, आज्ञादाला आ प्रारम्भिक रस्म#
बरात आगमन सबसँ जीवंत आ उत्साहपूर्ण क्षण होइत अछि। ढोल, नगाड़ा, शहनाई आ मंगल गीत सँ गूंजि उठैत अछि। द्वार फूल, आमक पात आ रंगोली सँ सजाओल जाइत अछि।
"अतिथि देवो भव" अनुसार सम्मानपूर्वक भीतर लऽ जायल जाइत अछि।
आज्ञादाला (AagyaDala)
कन्या पक्षक वरिष्ठ सदस्य चंगेडा (बाँस सँ बनल पात्र) लऽ कऽ वर पक्षक प्रतिनिधि लग जाइत छथि। एहि मे धूप, अगरबत्ती आ पवित्र सामग्री रहैत अछि। वर पक्ष वस्त्र, आभूषण आ उपहार चंगेडा मे रखैत छथि — दुनू परिवारक सम्मान, सहमति आ विवाहक औपचारिक शुरुआत।
पारिछन (Parichhan)वरक स्वागत आ परीक्षा रस्म#
विधकारी — अनुभवी महिला — पारिछनक दौरान वर सँ घरेलू जीवन सँ जुड़ल प्रश्न पूछैत छथि। महिलासभ पारम्परिक गीत गाबैत छथि।
वर केँ काजल आ चानन लगाओल जाइत अछि। विधकारी वर केँ नाक पकड़ि कऽ (बेतल पातक सहारे) कोहबर घर मे प्रवेश कराबैत छथि — विवाहक सबसँ मनोरंजक आ यादगार पल।
कोहबर घर प्रवेश आ कोहबर परम्परा#
कोहबर घर विवाहक सबसँ पवित्र स्थान — दीवार पर मधुबनी चित्रकला शैली मे कोहबर, जमीन पर अरिपन, कलश आ दीप। ई नव दम्पति केँ एक संग समय बितेबाक पहिल पवित्र स्थान होइत अछि।
नैनाजोगिन (Naina Jogin)वधू केँ पहचानबाक खेल#
वधू सखी सभक संग भारी चादर या घूंघट मे छुपाओल जाइत अछि। वर केँ एक-एक कऽ कऽ अपन पत्नी केँ पहचानबाक प्रयास — कखनो गलती सँ दोसर महिला केँ चुनि लैत छथि, जे माहौल केँ आओर मनोरंजक बना दैत अछि।
ओठंगर कूटनाहास्यपूर्ण आ प्रतीकात्मक रस्म#
नैनाजोगिनक बाद ओठंगर कूटना — हल्का मजाकिया वातावरण, घरेलू जीवनक प्रतीकात्मक क्रिया, वर केँ तनाव मुक्त करैत अछि।
कन्यादान आ विवाह यज्ञ#
सबसँ गंभीर आ वैदिक चरण। कन्यादान — मिथिलाक सबसँ उच्च आ पवित्र दान। पिता कन्या केँ वर केँ सौंपैत छथि। विवाह यज्ञ — अग्नि केँ साक्षी मानि सब रस्म, वर–वधू अग्नि के चारू ओर फेरा।
लावाधाननव जीवनक प्रथम संयुक्त कदम#
कोनिया — बाँस सँ बनल पात्र। वधू ओहि केँ पकड़ैत छथि, वर कंधा सँ सहारा दैत छथि। भाई लावा (भुना धान) तीन बेर छिड़कैत छथि — वर–वधू मिलि कऽ ओहि लावा केँ हवा मे उड़बैत छथि आ तीन चक्कर लगबैत छथि — समृद्धि, उन्नति आ साझा जीवनक प्रतीक।
विवाह रात्रिशिलारोहण, सिंदूरदान, घूंघट आ नागर#
शिलारोहण — वधू पयर पवित्र शिला पर, स्थिरता आ दृढ़ताक प्रतीक।
सिंदूरदान — विवाह रात्रि मे भुसवा सिंदूर (हल्का गुलाबी); असली लाल सिंदूर चतुर्थी मे।
घूंघट रस्म — वरक बड़ भाई वधू केँ वस्त्र भेटैत छथि; घूंघट तीन बेर नीचे-ऊपर।
चुमावन, दौर्बाक्षत — वरिष्ठ महिला आशीर्वाद।
नागर — बहिन/फुआ द्वारा कोहबर मे दू माटिक घड़ा — गृहस्थ जीवनक स्थिरता।
विवाहक द्वितीय दिनगौरी पूजन, मौहक, ढकनछोरी#
वर, वधू आ विधकारी चारि दिन केवल मीठ भोजन (नमक रहित), स्नान निषेध — तपस्या आ संयमक प्रतीक।
गौरी पूजन — सौभाग्य आ सुखी दाम्पत्य। वर वधूक चोटी खोलैत छथि। मौहक — मिठाई, खीर, पारम्परिक भोजन। ढकनछोरी — हँसी-मजाक मे वर केँ उलझबैत छथि।
चतुर्थी (मुख्य विवाह दिन)#
सबसँ महत्वपूर्ण आ अंतिम वैदिक विवाह दिन। पुनः विवाह वस्त्र, विवाह यज्ञ, अग्नि के चारू ओर फेरा, लाल सिंदूर — विवाहक पूर्णता।
दानौही — कन्या पंच सुहागिन के संग पोखरि पर; थारी मे सिंदूर, सतनजा, तेल, वस्त्र; पाँच महिला मांग मे सिंदूर आ माथ पर तेल — सुख, सौभाग्य आ दीर्घायुक कामना।
विधकारीरीतिक पूर्णताक संस्कार#
विधकारी मिथिला विवाहक ओ सोपान थिक जे सम्पूर्ण विवाह-रीतिक औपचारिक समापन करैत अछि। "विध" अर्थात् विधि आ "कारी" अर्थात् पूर्ण करनिहार।
चतुर्थी आ दानौहीक बाद परिवार बचल-खुचल औपचारिकताक पूर्णताक तैयारी करैत अछि। पंडित, बुजुर्ग आ परिवारक सदस्य एकत्र होइत छथि। शेष पूजा, हवन वा मंगल-कार्य सम्पन्न कएल जाइत अछि। जे कोनो रीति बाँकी रहल हो, ओकर औपचारिक समापन होइत अछि। पंडित संकल्प आ मंत्रोच्चारक संग सम्पूर्ण विवाह-प्रक्रियाक पूर्णताक घोषणा करैत छथि। दान-दक्षिणा आ आशीर्वादक संग ई सोपान सम्पन्न होइत अछि।
विधकारी सिखबैत अछि जे प्रत्येक कार्य पूर्णता आ क्रमबद्धताक संग समाप्त होएबाक चाही — मिथिलाक संस्कारक विशेषता।
चुमानआशीर्वादक कोमल स्पर्श#
चुमान मिथिला विवाहक ओ कोमल आ स्नेहमय सोपान थिक जाहिमे परिवारक बुजुर्ग नव दम्पतिकें आशीर्वाद दैत छथि। ई रीति प्रायः विवाहक बाद, विदाईसँ पहिने वा गृहप्रवेशपर होइत अछि।
बुजुर्ग महिला सभ थारी, सिन्दूर, अक्षत आ मंगल-द्रव्य लए तैयार रहैत छथि। ओ नव दम्पतिक माथपर स्नेहसँ हाथ वा अक्षत स्पर्श करबैत छथि आ मंगल-गीत गबैत छथि। ई स्पर्श वात्सल्य आ आशीर्वादक प्रतीक थिक — नव जीवनकें केवल रीति नहि, बुजुर्गक छत्रछाया सेहो आवश्यक अछि।
विदाईभावुक प्रस्थानक क्षण#
विदाई मिथिला विवाहक सभसँ भावुक सोपान थिक। ई ओ क्षण थिक जखन कन्या आजीवन पलल-बढ़ल अपन मायकेकें छोड़ि ससुराल दिस प्रस्थान करैत छथि।
सम्पूर्ण रीति-रिवाजक बाद परिवारक सभ सदस्य एकत्र होइत छथि। वातावरणमे स्नेह आ नोरक मिश्रित भाव रहैत अछि। कन्या अपन माता-पिता, भाई-बहिन आ बुजुर्ग सभकें गला लगा विदाई लैत छथि। एकटा परंपरामे कन्या पाछाँ दिस मुट्ठी-भरि अक्षत वा चाउर फेकैत छथि — ई संकेत जे ओ मायकेक ऋण चुका रहल छथि आ समृद्धि छोड़ि जा रहल छथि। पिता बेटीक हाथ वरकें सौंपि अंतिम आशीर्वाद दैत छथि।
"जाइत छी बेटी, जाइत छी बेटी।
माय-बाप छोड़ि, जाइत छी बेटी।।"
विदाई त्याग, प्रेम आ नव आरंभक प्रतीक थिक — बेटी दू कुलकें जोड़निहार सेतु होइत अछि। एहि क्षणमे दुख आ आशीर्वाद दूनू समाहित रहैत अछि।
गृहप्रवेशनव घरमे शुभ पगधरनी#
गृहप्रवेश ओ शुभ सोपान थिक जखन नव वधू पहिल बेर अपन ससुराल अर्थात् नव घरमे प्रवेश करैत छथि।
ससुरालमे घरकें रंगोली, फूल आ दीपसँ सजाओल जाइत अछि। देहरीपर हरदी वा सिन्दूर-घोलल अरिपन राखल जाइत छैक। एकटा कलश वा धान-भरल पात्र देहरीपर राखल जाइत अछि।
नव वधू दाहिन पएरसँ देहरीपर राखल कलशकें स्पर्श कए वा हल्का धकेलि भीतर प्रवेश करैत छथि — ई समृद्धिक आगमनक प्रतीक। ओ देहरीपर अपन हरदी-रंगल पगचिन्ह छोड़ैत छथि, जे शुभता आ लक्ष्मीक आगमनक संकेत मानल जाइत अछि। सासु आ बुजुर्ग महिला आरती उतारि स्वागत करैत छथि। मिथिलामे नव वधूकें लक्ष्मी-स्वरूप मानल जाइत अछि।
दुर्गमनमायके दिस पहिल वापसी#
दुर्गमन मिथिला विवाहक ओ स्नेहमय सोपान थिक जखन विवाहक बाद नव वधू पहिल बेर अपन मायके वापस आबैत छथि।
विदाईक किछु दिन वा सप्ताहक बाद दुर्गमनक अवसर आबैत अछि। मायकेमे परिवार बेटीक स्वागतक तैयारीमे जुटि जाइत अछि — हुनकर प्रिय भोजन, उपहार आ स्नेहक संग। नव वधू अपन पति वा परिवारक संग मायके पहुँचैत छथि। माता-पिता आ भाई-बहिन हुनका हर्षसँ गला लगबैत छथि।
किछु दिन ओ अपन परिचित वातावरणमे रहैत छथि, पुरान सखी सभसँ भेँट करैत छथि। विदाईक नोर एतय हर्षमे बदलि जाइत अछि। दुर्गमन सिखबैत अछि जे विवाहक बाद बेटीक आ मायकेक संबंध समाप्त नहि होइत — ई एकटा नव रूप ग्रहण करैत अछि।
मधुश्रावणीनवविवाहित कन्याक लोकसंस्कार#
मधुश्रावणी मिथिलाक लोकजीवन मे अत्यन्त विशिष्ट पर्व अछि। ई केवल पूजा-पाठ नहि, बल्कि नवविवाहित कन्याक जीवनक एक महत्वपूर्ण संस्कार मानल जाइत अछि। प्रायः विवाहक पहिल वर्षक भीतर, विशेष रूप सँ मायके मे मनाओल जाइत अछि।
सावन मासक हरियर वातावरण, वर्षाक बून्द आ प्रकृतिक नव सौन्दर्यक बीच ई पर्व आरम्भ होइत अछि। मिथिला मे सावन प्रकृतिक नवजीवनक मास मानल जाइत अछि।
ओरियौन — तैयारीक आरम्भ
मधुश्रावणीक शुरुआत ओरियौन सँ होइत अछि — पर्व लेल सामग्रीक तैयारी। नव वस्त्र, चूड़ा, दही, फल, मिठाई, अन्न, पूजा सामग्री। कसार (चाउरक पीठ आ गुड़) मंगलमय अवसरक प्रमुख मिष्टान्न अछि।
मधुश्रावणी केवल बेटीक व्रत नहि, बल्कि पूरा परिवारक उत्सव होइत अछि।
पुरोहित्नी आ कथा-वाचन
कथा सुनाबयवाली महिला केँ पुरोहित्नी कहल जाइत अछि। ओ प्रतिदिन कथा सुनबैत छथि — मैना-मंजरी, बिहुला-विषहरी, शिव-पार्वती विवाह, नाग-नागिनक कथा। गामक बुजुर्ग कहैत छथि जे मधुश्रावणी नवविवाहित कन्याक जीवनक विद्यालय जेकाँ अछि।
नाग-पूजा, फुलौढ़ी आ अलोना भोजन
नाग-पूजा पर्वक केन्द्र अछि — नागदेवता प्रकृतिक रक्षक मानल जाइत अछि। आंगन मे चाउरक घोल सँ नाग-नागिनक अरिपन बनाओल जाइत अछि।
फुलौढ़ी — साँझक समय नवविवाहित कन्या सभ समूह बना कऽ फूल आ पवित्र पात चुनबाक लेल निकलैत छथि; गीत, हँसी-ठिठोली आ प्रकृतिक संग आत्मीय सम्बन्ध।
अलोना भोजन — नमक रहित भोजन; धैर्य, संयम आ आत्मनियंत्रणक प्रतीक।
भर, समापन भोज आ टेमी दाग
वर पक्ष दिस सँ भर (वस्त्र, श्रृंगार, मिठाई, मखाना, पान) पठाओल जाइत अछि — ससुराल पक्षक प्रेम आ सम्मानक प्रतीक।
अंतिम दिन विशेष भोज — पंगत मे दाल, भात, खीर, मिठाई। टेमी दाग — रूईक बत्ती सँ घुटना वा पैरक समीप हल्का स्पर्श; धैर्य, सहनशीलता आ गृहस्थ जीवनक जिम्मेदारी स्वीकार करबाक प्रतीक।
मायकेक स्नेह, पुरोहित्नीक ज्ञान, फुलौढ़ीक उल्लास, भरक सम्मान — ई सभ मिलि मधुश्रावणी केँ मिथिलाक सबसे विशिष्ट आ आत्मीय लोकपर्व बना दैत अछि।
कोजगराशरद पूर्णिमाक लक्ष्मी-उत्सव#
कोजगरा मिथिलाक ओ विशेष उत्सव थिक जे शरद पूर्णिमापर नव विवाहित दम्पति, विशेषतः नव जमायक लेल मनाओल जाइत अछि।
कन्या-पक्ष नव जमायक लेल मखान, पान, मिठाई आ उपहारक भव्य तैयारी करैत अछि। घरकें दीप आ रंगोलीसँ सजाओल जाइत छैक। चान्दनी रातिमे लक्ष्मी पूजा होइत अछि।
शरद पूर्णिमाक उज्ज्वल चन्द्रमाक नीचाँ लक्ष्मीक पूजा होइत अछि। नव जमायकें विशेष आसनपर बैसाए मखान, बताशा, पान आ उपहार भेँट कएल जाइत छैक। रातिमे परिवार एकत्र होइत भोज आ हँसी-ठट्ठाक आनंद लैत छथि। मान्यता थिक जे एहि रातिमे लक्ष्मी "को जागर्ति?" (के जागि रहल अछि?) पुछैत भ्रमण करैत छथि।
कोजगरा समृद्धि, सौभाग्य आ नव संबंधक मंगल-कामनाक प्रतीक थिक — चान्दनी रातिमे लक्ष्मीक आशीर्वाद आ पारिवारिक स्नेहसँ नव दाम्पत्यकें सिंचित करैत अछि।
बाइस पवित्र अनुष्ठानपूर्ण यात्रा#
मिथिलाक विवाह एकटा उत्सव नहि — ई बाइस अलग-अलग अनुष्ठानक श्रृंखला अछि, प्रत्येकक अपन अर्थ आ अपन क्षण।
पूर्व-विवाह — परीक्षण, सगुन, अमोघ विवाह, मात्रिका पूजा।
बरयात्रा आ स्वागत — बरयात्रा, मौहक, परिछन, पाग-दोपट्टा।
मुख्य संस्कार — कन्यादान, पाणिग्रहण, सप्तपदी, सिंदूरदान।
विवाहोपरांत — कोहबर, ढकनछोरी, चुमान, विदाई, गृहप्रवेश।
दीर्घकालीन — दुर्गमन, मधुश्रावणी, कोजगरा।
बाइस पवित्र अनुष्ठानसंक्षिप्त सूची#
विस्तृत रस्म: परीक्षण, पारिछन, कोहबर, कन्यादान, विदाई, मधुश्रावणी।
विदाई गीत#
"जाइत छी बेटी, जाइत छी बेटी। माय-बाप छोड़ि, जाइत छी बेटी।।"
विशेष भोजन#
दालपुड़ी, मालपुआ, ठेकुआ — विवाह-भोजक पारंपरिक व्यंजन।
How did this make you feel?
Read next
Part 1 of series
Parikshan — Mithila Vivahak Pahil Sopan
13 min read







After the story
Comments (0)
Sign in to share your thoughts on this article.