सामा-चकेवा — मिथिलाक अनोखा लोकपर्व
त्योहार· 15 min

Sama-ChakevaMithila's Unique Folk Festival

सामा-चकेवा — मिथिला का अनोखा लोकपर्व

विवेक झा·23 Jun 2026

Among Mithila's sweetest folk festivals — sibling love, clay figures, folk songs, and moonlit Kartik evenings.

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विवेक झा
Vivek Jha·15 min read·23 Jun 2026

सामा-चकेवा मिथिलाक सर्वाधिक मधुर, रंगीन आ भावनात्मक लोकपर्वसभमे सँ एक अछि। ई पर्व भाइ-बहिनक प्रेम, प्रकृतिप्रेम आ लोकसंस्कृतिक अद्भुत संगम प्रस्तुत करैत अछि। कार्तिक मासक शुक्ल सप्तमीसँ आरम्भ भऽ कार्तिक पूर्णिमा धरि चलनिहार ई उत्सव मुख्य रूपसँ मिथिला, नेपालक तराई क्षेत्र आ प्रवासी मैथिल समाजमे अत्यन्त उत्साहक संग मनाओल जाइत अछि।

ई पर्व विशेष रूपसँ कुमारिका कन्या, युवती आ विवाहित महिलासभक द्वारा मनाओल जाइत अछि। प्रत्येक साँझ लोकगीत, नृत्य, माटिक रंग-बिरंग मूर्तिसभ आ भाइ-बहिनक स्नेहक वातावरण सम्पूर्ण मिथिलामे एक विशिष्ट सांस्कृतिक छटा बिखेरैत अछि।

पौराणिक कथा#

सामा-चकेवाक उत्पत्तिक सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्णक पुत्री सामा आ हुनकर पति चकेवा सँ जोड़ल जाइत अछि।

लोककथाक अनुसार, सामापर मिथ्या आरोप लगाओल गेल छल। एहि कारण हुनका शापवश पक्षीक रूप धारण करय पड़लनि। सामाक पति चकेवा सेहो पत्नीप्रेममे पक्षीक रूप धारण कऽ लेलनि। सामाक भाइ शाम्ब सत्यक पक्षमे ठाढ़ भऽ सामा आ चकेवाकेँ शापसँ मुक्त करौलनि।

एहि कथामे भाइ-बहिनक प्रेम, दाम्पत्य निष्ठा आ सत्यक विजयक संदेश निहित अछि। ताहि कारण मिथिलामे भाइ-बहिनक प्रेमक प्रतीकस्वरूप सामा-चकेवा पर्व मनाओल जाइत अछि।

पर्वक समय#

ई पर्व कार्तिक शुक्ल सप्तमीसँ आरम्भ भऽ कार्तिक पूर्णिमा धरि चलैत अछि। छठ महापर्वक समापनक तुरन्त बाद सामा-चकेवाक उत्सव प्रारम्भ होइत अछि।

विशेषतः—

  • ◆कार्तिक शुक्ल सप्तमी — पर्वक आरम्भ
  • ◆प्रतिदिन साँझ — सामा खेल
  • ◆कार्तिक पूर्णिमा — सामा-चकेवाक विदाई

माटिक मूर्तिक निर्माण #

सामा-चकेवा पर्वक मुख्य आकर्षण रंग-बिरंग माटिक मूर्तिसभ छथि। महिलासभ आ कन्यासभ अपन हाथसँ ई मूर्तिसभ तैयार करैत छथि।

प्रमुख पात्रसभ—

सामा

भगवान कृष्णक पुत्रीक प्रतीक, जे सुन्दर पक्षीक रूपमे बनाओल जाइत अछि।

चकेवा

सामाक पति, प्रेम आ समर्पणक प्रतीक।

चुगला

चुगलखोर व्यक्तिक प्रतीक, जे मिथ्या आरोप आ बुराइक प्रतिनिधित्व करैत अछि।

सतभैया

भाइसभक प्रतीक।

वृन्दावन

पेड़-पौधा, प्रकृति आ हरियालीक प्रतीक।

डोला, घर, पान, फल-फूल

लोकजीवनक विभिन्न पक्षक प्रतीकात्मक रूप।

मूर्तिसभकेँ रंगीन रंग, धानक बाली, फूल-पात आ सजावटी सामग्रीसँ सजाओल जाइत अछि।

साँझक उत्सव #

प्रतिदिन साँझमे गामक युवती, कन्या आ महिलासभ समूहमे एकत्रित होइत छथि। बाँसक डलिया अथवा सूपमे सामा-चकेवाक मूर्ति राखि दीप जरा कऽ लोकगीत गाओल जाइत अछि।

ई उत्सव केवल धार्मिक नहि, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप, हँसी-खुशी आ सांस्कृतिक आदान-प्रदानक अवसर सेहो थिक।

लोकसभ सामा खेलैत छथि, नृत्य करैत छथि आ पारम्परिक गीत गाबैत छथि।

लोकगीतक मधुरता #

सामा-चकेवा लोकगीत मिथिलाक सांस्कृतिक आत्मा मानल जाइत अछि। पीढ़ी-दर-पीढ़ी ई गीत लोकक कण्ठमे जीवित छथि।

प्रसिद्ध गीत—

"सामा खेलब रे सखि, सामा खेलब।

भैया हमर कुशल रहथि, सामा खेलब।।"

"सामा आइल पहाड़ सँ, चकेवा संग लऽ आयल।"

"सामा-चकेवा खेलय चलू सखी, कार्तिकक चानन राति।"

गीतसभमे भाइ-बहिनक प्रेम, प्रकृतिक सौन्दर्य आ लोकजीवनक झलक स्पष्ट देखल जाइत अछि।

पूर्णिमाक विदाई #

कार्तिक पूर्णिमाक दिन सामा-चकेवा पर्वक समापन होइत अछि। एहि अवसरपर भाइसभ विशेष रूपसँ सहभागी होइत छथि।

लोकपरम्परानुसार सामा-चकेवाक मूर्तिसभकेँ जलमे विसर्जित कएल जाइत अछि अथवा प्रतीकात्मक विदाई देल जाइत अछि। किछु स्थानपर चुगलाक मूर्तिक दहन सेहो कएल जाइत अछि, जे असत्य आ बुराइक अन्तक प्रतीक मानल जाइत अछि।

विदाईक समय भावुक वातावरण बनि जाइत अछि, आ बहिनसभ अपन भाइसभक दीर्घायु, सुख-समृद्धि आ कुशलताक कामना करैत छथि।

प्रकृति आ पक्षीसँ सम्बन्ध#

सामा-चकेवा केवल भाइ-बहिनक प्रेमक पर्व नहि, बल्कि प्रकृति आ पक्षीसँ मानवीय सम्बन्धक सेहो प्रतीक अछि।

मिथिलामे मान्यता अछि जे जाड़क प्रारम्भमे हिमालय क्षेत्रसँ विभिन्न पक्षी मिथिलामे अबैत छथि। सामा-चकेवा पर्व ओहि प्रवासी पक्षीसभक स्वागतक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति सेहो मानल जाइत अछि।

एहि कारण ई पर्व पर्यावरण संरक्षण आ प्रकृतिप्रेमक संदेश सेहो दैत अछि।

सामाजिक आ सांस्कृतिक महत्व#

  • ◆भाइ-बहिनक प्रेमक प्रतीक
  • ◆लोकगीत आ लोककलाक संरक्षण
  • ◆सामूहिकता आ सामाजिक मेल-मिलाप
  • ◆प्रकृतिप्रेम आ पर्यावरण चेतना
  • ◆मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिताक प्रतीक

प्रवासी मैथिल समाजमे सामा-चकेवा#

आइ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, काठमांडू, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया आ खाड़ी देशसभमे बसल मैथिल परिवार सेहो सामा-चकेवा पर्व अत्यन्त श्रद्धा आ उत्साहक संग मनबैत छथि।

एहि माध्यमसँ नव पीढ़ी अपन भाषा, लोकगीत आ सांस्कृतिक विरासतसँ जुड़ल रहैत अछि।

वैश्विक पहचान#

सामा-चकेवा मिथिलाक अमूल्य अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर थिक। विभिन्न सांस्कृतिक संस्था एकरा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर पहचान दिलेबाक प्रयास करैत अछि। मुदा वर्तमान समय धरि UNESCO द्वारा एकरा आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहि भेल अछि।

निष्कर्ष#

सामा-चकेवा केवल एक लोकपर्व नहि, बल्कि मिथिलाक जीवित संस्कृति, भाइ-बहिनक प्रेम, प्रकृतिप्रेम आ लोककलाक उत्सव थिक।

कार्तिकक चाननी राति, माटिक रंगीन मूर्ति, मधुर लोकगीत आ बहिनसभक स्नेह — ई सभ मिलिकऽ सामा-चकेवाकेँ मिथिलाक सर्वाधिक मनमोहक पर्वसभमे स्थान प्रदान करैत अछि।

"सामा-चकेवा मिथिलाक हृदयक गीत अछि, जाहिमे प्रेम, प्रकृति आ परम्पराक मधुर स्वर गुँजल रहैत अछि।"

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Originally published on MithilaDwaar · 23 June 2026 · Vivek Jha

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