फगुवा — मिथिलाक रंग, हँसी आ गीतक उत्सव
त्योहार· 18 min

PhaguwaMithila's Festival of Colour, Laughter and Song

फगुवा — मिथिला का रंग, हँसी और गीत का उत्सव

शीतल झा·23 Jun 2026

Falgun Purnima — Holika Dahan, abir, Phagua songs, traditional foods and community celebration in Mithila.

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श
शीतल झा
Shital Jha·18 min read·23 Jun 2026

फगुवा अर्थात् होली मिथिलाक सर्वाधिक उल्लासपूर्ण आ लोकप्रिय लोकपर्वसभमे सँ एक मानल जाइत अछि। ई पर्व फाल्गुन मासक पूर्णिमा तिथिकें मनाओल जाइत अछि आ वसन्त ऋतुक आगमन, प्रकृतिक नवजीवन आ सामाजिक मेल-मिलापक प्रतीक थिक।

मिथिलाक फगुवा केवल रंग खेलबाक पर्व नहि, बल्कि लोकगीत, हास्य-व्यंग्य, नृत्य, संगीत, भक्ति आ सामुदायिक एकताक महाउत्सव थिक। गामसँ लऽ कऽ शहर धरि सम्पूर्ण वातावरण रंग, अबीर, ढोलक आ फगुआ गीतसँ गुँजि उठैत अछि।

फगुवाक पौराणिक महत्त्व#

फगुवाक सम्बन्ध भगवान विष्णुक भक्त प्रह्लाद आ होलिकाक कथासँ जोड़ल जाइत अछि। पुराणक अनुसार भक्त प्रह्लादक अटल भक्ति कारण भगवान विष्णु हुनकर रक्षा कएलनि आ होलिका अग्निमे भस्म भऽ गेलीह।

एहि घटनाक स्मरणमे होलिका दहन कएल जाइत अछि, जे सत्यक असत्यपर, भक्तिक अहंकारपर आ धर्मक अधर्मपर विजयक प्रतीक मानल जाइत अछि।

फगुवा भगवान श्रीकृष्ण आ राधाक प्रेमलीलासँ सेहो गहराईसँ जुड़ल अछि। मिथिलाक बहुतो फगुआ गीत राधा-कृष्णक होरीक वर्णन करैत अछि।

होलिका दहन#

फाल्गुन पूर्णिमासँ एक दिन पूर्व सन्ध्याकाल गाम-घरमे होलिका दहन कएल जाइत अछि।

लोकसभ लकड़ी, उपला आ अन्य सामग्रीसँ होलिका तैयार करैत छथि। विधिपूर्वक पूजनक पश्चात् अग्नि प्रज्वलित कएल जाइत अछि।

लोकविश्वास अछि जे होलिका दहनसँ नकारात्मक शक्ति, रोग, दुःख आ अशुभताक अन्त होइत अछि आ नव जीवनक शुभ आरम्भ होइत अछि।

अबीर आ प्राकृतिक रंगक परम्परा#

मिथिलामे परम्परागत रूपसँ प्राकृतिक अबीर आ गुलालक विशेष महत्त्व रहल अछि।

टेसू (पलाश)क फूल, हल्दी, चन्दन आ अन्य प्राकृतिक वस्तुसँ रंग तैयार कएल जाइत छल। प्राकृतिक रंग स्वास्थ्य आ पर्यावरण दुनूक लेल लाभदायक मानल जाइत अछि।

आजुओ बहुतो स्थानपर प्राकृतिक रंगसँ होली खेलबाक परम्परा जीवित अछि।

फगुआ गीत#

फगुवा मिथिलाक लोकसंगीतक एक महत्वपूर्ण अंग थिक।

फगुआ गीतमे राधा-कृष्णक होरी, प्रेम, हास्य, सामाजिक व्यंग्य आ ग्रामीण जीवनक सुन्दर चित्रण भेटैत अछि।

ढोलक, झाल, मंजीरा आ हारमोनियमक संग सामूहिक रूपसँ ई गीत गाओल जाइत अछि। महिलासभ आ पुरुषसभ अलग-अलग टोली बना कऽ गीत गबैत छथि।

मिथिलाक विशेष परम्परा#

फगुवाक अवसरपर गाम-घरमे हँसी-मजाक, अपनत्व आ सामाजिक मेल-मिलापक विशेष वातावरण बनि जाइत अछि।

परम्परानुसार—

  • ◆अबीर आ गुलालसँ रंग खेलल जाइत अछि।
  • ◆ढोलक आ मंजीराक संग फगुआ गीत गाओल जाइत अछि।
  • ◆मित्र, नात-सम्बन्धी आ पड़ोसी एक-दोसराक घर जायत छथि।
  • ◆बड़-बुजुर्गक चरण स्पर्श कऽ आशीर्वाद लेल जाइत अछि।
  • ◆गाममे हास्य-परिहास आ लोकनृत्यक आयोजन होइत अछि।

फगुवाक विशेष भोजन#

मिथिलामे फगुवाक अवसरपर अनेक प्रकारक पारम्परिक व्यंजन तैयार कएल जाइत अछि।

प्रमुख व्यंजनसभमे—

  • ◆मालपुआ
  • ◆दही-बड़ा
  • ◆पुआ
  • ◆पापड़
  • ◆कचौड़ी
  • ◆तरुआ
  • ◆गुजिया
  • ◆ठंडाई

विशेष रूपसँ बनाओल जाइत अछि।

किछु स्थानपर परम्परागत रूपसँ भाँगयुक्त ठंडाईक सेहो प्रचलन देखल जाइत अछि।

सामाजिक आ सांस्कृतिक महत्त्व#

फगुवा समाजमे भेदभाव भुलाकऽ प्रेम, मेल-मिलाप आ भाईचाराक सन्देश दैत अछि।

ई पर्व पुरान मनमुटाव समाप्त कऽ नव सम्बन्ध स्थापित करबाक अवसर मानल जाइत अछि। एहि दिन लोकसभ एक-दोसराकेँ अबीर लगाकऽ शुभकामना दैत छथि।

मिथिलाक फगुवा लोकसंस्कृति, लोकसंगीत आ सामुदायिक जीवनक सजीव उदाहरण थिक।

आधुनिक समयमे फगुवा#

आधुनिक समयमे शहरी क्षेत्रसभमे फगुवा मनाबयक शैलीमे परिवर्तन अवश्य अएल अछि, मुदा मिथिलाक गामसभमे आइयो पारम्परिक फगुआ गीत, ढोलक, प्राकृतिक रंग आ सामूहिक उत्सवक परम्परा जीवित अछि।

देश-विदेशमे बसल मैथिल समाज सेहो उत्साहपूर्वक फगुवा मना कऽ अपन सांस्कृतिक पहचानकेँ जीवित रखने छथि।

पर्वक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि#

फगुवाक जड़ मिथिलाक प्राचीन लोकजीवनमे गहराईसँ जुड़ल अछि। पुराण, लोककथा, आ ग्रामीण स्मृति — तीनू मिलि ई पर्वकें समृद्ध अर्थ दैत अछि। मिथिलामे पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि — ई सामाजिक एकता, पारिवारिक मिलन, आ लोकसंस्कृतिक संचरणक माध्यम अछि।

विधि आ परम्परा#

फगुवा मनाबैत समय घर-आंगन सफा कएल जाइत अछि, दीपक जलाओल जाइत अछि, आ पूजा-सामग्री तैयार कएल जाइत अछि। बुजुर्ग परिवारक सदस्य विधि-विधानक मार्गदर्शन करैत छथि। महिला सभ रसोई, सजावट, आ प्रसादक तैयारीमे अग्रणी भूमिका निभाबैत छथि — ई मिथिलाक स्त्री-संस्कृतिक विशेषता अछि।

लोकगीत आ सामूहिक उत्सव#

फगुवाक अवसरपर मिथिलाक लोकगीत, ढोलक, मंजीरा, आ सामूहिक नृत्यक विशेष महत्व होइत अछि। गाम-घरक महिला-पुरुष एकत्र होइत छथि, पुरान गीत गाबैत छथि, आ नव पीढ़ीकेँ परंपरा सिखाओल जाइत अछि। ई सामूहिक भागीदारी पर्वकें जीवंत बनाबैत अछि।

भोजन आ प्रसाद#

मिथिलामे फगुवाक अवसरपर विशेष पारम्परिक व्यंजन बनाओल जाइत अछि — दही, चूड़ा, तरुआ, खीर, लिट्टी, मछ-भात, आ मौसमानुसार सब्जी। भोजन केवल पेट भरबाक साधन नहि — ई आतिथ्य, प्रेम, आ साझा संस्कृतिक अनुभवक प्रतीक अछि।

आधुनिक चुनौती आ संरक्षण#

शहरीकरण, पलायन, आ व्यस्त जीवनशैलीक कारण फगुवा जेकाँ पर्व सिमटि रहल अछि। मुदा सांस्कृतिक संस्था, स्कूल, डिजिटल माध्यम, आ जागरूक परिवार — एहि सभ मिलि परंपराकें पुनर्जीवित करबामे सहायक हो सकैत अछि। विदेशमे बसल मैथिल परिवार ऑनलाइन पूजा, वीडियो कॉल, आ सामुदायिक मिलनसँ जुड़ल रहैत अछि।

विरासत आ भविष्य#

फगुवा मिथिलाक सांस्कृतिक पहचानक अभिन्न अंग अछि। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सहरसा आ जनकपुर — सभ क्षेत्रमे ई परंपरा अलग-अलग रूपमे जीवित अछि। ग्रामीण मेला, पारिवारिक संस्कार, आ सामूहिक उत्सव — एहि सभ स्थलपर एकर जीवंत रूप देखल जा सकैत अछि। मिथिलाक युवा पीढ़ी, डिजिटल माध्यम, आ सांस्कृतिक संस्थासभ मिलि एकर संरक्षणक नव रास्ता खोलि रहल अछि। विदेशमे बसल मैथिल समुदाय सेहो अपन माटि, भाषा, आ रीति-रिवाजसँ जुड़ल रहैत अछि।

निष्कर्ष#

फगुवा मिथिलाक रंग, संगीत, हास्य, प्रेम आ लोकजीवनक महाउत्सव थिक। ई पर्व केवल रंग खेलबाक अवसर नहि, बल्कि समाजमे अपनत्व, सौहार्द्र आ सांस्कृतिक एकताकेँ सुदृढ़ करबाक माध्यम थिक।

"फगुवाक रंग केवल शरीरपर नहि, बल्कि मन, सम्बन्ध आ समाजकेँ सेहो रंगीन बना दैत अछि।"

प्रसिद्ध फगुआ गीत#

"खेलत होरी राधे-श्याम, रंगसँ भरल बृंदावन।

अबीर उड़ाबथि कन्हैया, होरी खेलब मोरा मन।।"

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Originally published on MithilaDwaar · 23 June 2026 · Shital Jha

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Cite: Phaguwa — Mithila's Festival of Colour, Laughter and Song — MithilaDwaar (https://www.mithiladwaar.com/blog/phaguwa-mithila-ka-rang-utsav)

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