मैथिल घरमे नवरात्रि, दुर्गा पूजा आ रोजक भक्तिमे श्री दुर्गा चालीसाक पाठ अत्यन्त प्रिय अछि। दोहा आ चौपाईसँ माँक रूप, लीला आ कृपाक वर्णन होइत अछि। साँझ-भोर आरतीक संग वा एकाग्र मनसँ पाठ करू।
पूर्ण पाठ#
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥
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निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
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रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥
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तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
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अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
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प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
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शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
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रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
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धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्भा॥
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रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
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लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
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क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
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हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
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मातंगी धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता॥
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श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्नभाल भव दुःख निवारिणी॥
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केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
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कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥
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सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
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नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँ लोक में डंका बाजत॥
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शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज संहारे॥
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महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
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रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
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परी गाढ़ संतों पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥
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अमरपुरी अरु बासव लोका।
तव महिमा सब रहें अशोका॥
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ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी॥
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प्रेम भक्ति से जो यश गावै।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवै॥
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ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म मरण ताकौ छुटि जाई॥
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योगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
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शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
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निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
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शक्ति रूप का मर्म न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
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शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
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भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
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मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
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आशा तृष्णा निपट सतावै।
रिपु मूरख मोहिं अति डरपावै॥
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शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
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करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला॥
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जब लग जियूँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥
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दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परम पद पावै॥
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देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
शरणागत रक्षा करि, भक्त रहे निःशंक।
जय जय जय जगदम्बे, जय जय दुर्गे अंक॥
पाठक लाभमैथिल श्रद्धा#
जे प्रेम आ भक्तिसँ दुर्गा चालीसा गाबैत छथि, लोक विश्वास अनुसार दुःख-दारिद्र दूर रहैत अछि आ मनमे शांति अबैत अछि। पूजाक पूर्ण सामग्री लेल देखू दुर्गा पूजा सामग्री सूची आ महत्त्व लेल दुर्गा पूजा — मिथिलाक महापर्व।




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