दुर्गा पूजा अथवा शारदीय नवरात्रि मिथिलाक प्रमुख धार्मिक आ सांस्कृतिक पर्वसभमे सँ एक मानल जाइत अछि। ई पर्व आश्विन मासक शुक्ल पक्षक प्रतिपदासँ नवमी धरि नौ दिन आ दशमी धरि उत्सवक रूपमे मनाओल जाइत अछि। एहि अवधिमे आदिशक्ति माँ दुर्गाक नव रूपक आराधना कएल जाइत अछि आ सम्पूर्ण मिथिलामे भक्तिमय वातावरण बनल रहैत अछि।
मिथिलामे दुर्गा पूजा केवल देवी आराधनाक पर्व नहि, बल्कि शक्ति, धर्म, संस्कृति, लोकपरम्परा आ सामुदायिक एकताक महाउत्सव थिक। गामसँ लऽ कऽ शहर धरि मंदिर, पूजा पंडाल आ घर-घरमे माँ दुर्गाक पूजा अत्यन्त श्रद्धा आ विधि-विधानसँ सम्पन्न होइत अछि।
दुर्गा पूजाक पौराणिक महत्त्व#
पुराणक अनुसार महिषासुर नामक अत्याचारी असुरकेँ पराजित करबाक लेल देवतासभक संयुक्त तेजसँ माँ दुर्गाक अवतार भेलनि। नौ दिन धरि घमासान युद्धक पश्चात् दशमीक दिन माँ दुर्गा महिषासुरक वध कएलनि।
एहि विजयक स्मृतिमे नवरात्रि आ विजयादशमी मनाओल जाइत अछि। ई पर्व सत्यक असत्यपर, धर्मक अधर्मपर आ शक्तिक अत्याचारपर विजयक प्रतीक मानल जाइत अछि।
नवदुर्गाक पूजा#
नवरात्रिक प्रत्येक दिन माँ दुर्गाक एक विशेष रूपक पूजा कएल जाइत अछि।
| दिन | देवी |
|---|---|
| प्रथम | शैलपुत्री |
| द्वितीय | ब्रह्मचारिणी |
| तृतीय | चन्द्रघण्टा |
| चतुर्थ | कूष्माण्डा |
| पंचम | स्कन्दमाता |
| षष्ठ | कात्यायनी |
| सप्तम | कालरात्रि |
| अष्टमी | महागौरी |
| नवमी | सिद्धिदात्री |
प्रत्येक रूप जीवनक भिन्न-भिन्न शक्ति, ज्ञान, साहस, करुणा आ सिद्धिक प्रतीक मानल जाइत अछि।
मिथिलाक दुर्गा पूजाक विशेषता#
मिथिलामे दुर्गा पूजाक अपन विशिष्ट स्वरूप अछि।
उच्चैठ भवानी (मधुबनी) मिथिलाक प्रमुख शक्तिपीठसभमे सँ एक मानल जाइत अछि। नवरात्रिक अवसरपर हजारों श्रद्धालु एहिठाम दर्शन लेल अबैत छथि।
अनेक मैथिल परिवारमे माँ कात्यायनीकेँ कुलदेवीक रूपमे विशेष श्रद्धासँ पूजल जाइत अछि। घर-घरमे कलश स्थापना, अखण्ड दीप, दुर्गा सप्तशती पाठ आ चण्डी पाठक परम्परा आइयो जीवित अछि।
गामसभमे सामूहिक पूजा, भजन-कीर्तन, जागरण आ सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन होइत अछि।
कलश स्थापना#
नवरात्रिक प्रथम दिन घटस्थापना अथवा कलश स्थापना कएल जाइत अछि।
पूजास्थलपर कलश स्थापित कऽ जौ अथवा धान बोओल जाइत अछि। ई नवजीवन, समृद्धि, उर्वरता आ शुभताक प्रतीक मानल जाइत अछि।
नौ दिन धरि अखण्ड दीप जरायल जाइत अछि आ प्रतिदिन देवीक आराधना कएल जाइत अछि।
दुर्गा सप्तशती पाठ#
मिथिलामे दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य)क पाठक विशेष महत्त्व अछि।
बहुतो परिवार आ मंदिरसभमे सम्पूर्ण नवरात्रिक दौरान दुर्गा सप्तशतीक नियमित पाठ होइत अछि। मान्यता अछि जे एहि पाठसँ भय, रोग, संकट आ नकारात्मक शक्तिक नाश होइत अछि तथा सुख-शान्ति आ समृद्धिक प्राप्ति होइत अछि।
अष्टमी आ नवमी#
महाष्टमी आ महानवमी नवरात्रिक सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन मानल जाइत अछि।
एहि दिन विशेष पूजा, हवन, पुष्पाञ्जलि आ कन्या पूजन कएल जाइत अछि। बालिकासभकेँ देवीक स्वरूप मानि हुनकर पूजन, चरण स्पर्श आ भोजन कराओल जाइत अछि।
बहुतो स्थानपर शस्त्र पूजन आ विशेष यज्ञ सेहो सम्पन्न होइत अछि।
विजयादशमी#
दशमीक दिन माँ दुर्गाक प्रतिमाक विसर्जन कएल जाइत अछि।
ई दिन बुराइक अन्त, सत्यक विजय आ नव आरम्भक प्रतीक मानल जाइत अछि। श्रद्धालु भावुक मनसँ माँकेँ विदा करैत छथि आ आगाँ वर्ष पुनः आगमनक प्रार्थना करैत छथि।
झिझिया नृत्य#
मिथिलामे विशेष रूपसँ दुर्गा पूजाक समय झिझिया लोकनृत्यक परम्परा सेहो प्रचलित अछि।
महिलासभ सिरपर छिद्रयुक्त माटिक घैलामे दीप जराकऽ लोकगीत गबैत नृत्य करैत छथि। लोकविश्वास अनुसार ई नृत्य महामारी, अकाल आ नकारात्मक शक्तिसँ रक्षा करैत अछि।
विशेषतः मिथिलाक मुसहर समुदाय आ ग्रामीण क्षेत्रमे झिझियाक परम्परा आइयो जीवित अछि।
दुर्गा पूजाक प्रसाद#
दुर्गा पूजामे विभिन्न प्रकारक प्रसाद अर्पित कएल जाइत अछि।
- ◆फल
- ◆नारियल
- ◆मखाना
- ◆बताशा
- ◆खीर
- ◆हलवा
- ◆पूड़ी
- ◆चना
- ◆पान-सुपारी
अष्टमी आ नवमीक अवसरपर विशेष भोग अर्पित कएल जाइत अछि।
सामाजिक आ सांस्कृतिक महत्त्व#
दुर्गा पूजा मिथिलामे केवल धार्मिक पर्व नहि, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप, पारिवारिक एकता आ सांस्कृतिक संरक्षणक माध्यम थिक।
नव वस्त्र धारण करब, मेला घूमब, सांस्कृतिक कार्यक्रममे भाग लेब, नाटक, भजन आ लोकगीतक आयोजन—ई सभ नवरात्रिक अभिन्न अंग छथि।
निष्कर्ष#
दुर्गा पूजा मिथिलाक शक्ति, श्रद्धा, संस्कृति आ लोकजीवनक महाउत्सव थिक। ई पर्व समाजकेँ साहस, धर्म, नारी शक्तिक सम्मान आ सत्यक मार्गपर चलबाक प्रेरणा दैत अछि।
"माँ दुर्गाक आराधनामे मिथिलाक श्रद्धा, शक्ति आ संस्कृतिक दिव्य स्वरूप प्रतिबिम्बित होइत अछि।"
दुर्गा स्तोत्र#
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।"
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