नवरात्रि आ दुर्गा पूजाक साँझ जखन दीप-शंख बजैत अछि, मैथिल घरमे माँक आरती गेनाइ एकटा जीवित परंपरा थिक। एहि लेखमे तीन प्रिय स्तुति — जय अम्बे गौरी, अम्बे तू है जगदम्बे काली, आ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये — पूर्ण रूपसँ देल गेल अछि।
1. जय अम्बे गौरीमाँ दुर्गा आरती#
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
>
माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥
>
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गलमाला, कंठन पर साजै॥
>
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
>
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥
>
शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥
>
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
>
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
>
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
>
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥
>
भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥
>
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
>
श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै॥
2. अम्बे तू है जगदम्बे काली#
अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएँ भारती,
ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
>
तेरे भक्त जनों पर माता,
भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पड़ो माँ,
करके सिंह सवारी॥
>
सौ-सौ सिंहों से है बलशाली,
अष्टभुजा वाली।
दुष्टों का तू नाम मिटाए,
भक्तों की रखवाली॥
>
माँ-बेटे का है इस जग में,
बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सुने हैं पर ना,
माता सुनी कुमाता॥
>
सब पर करुणा बरसाने वाली,
अमृत बरसाने वाली।
दीन-दुखी के संकट हरने,
आई सिंह सवारी॥
>
जो कोई श्रद्धा से गावे,
मनवांछित फल पावे।
सुख-सम्पत्ति घर में आवे,
दुःख-दरिद्र मिट जावे॥
>
अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
3. सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये#
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
>
सृष्टि-स्थिति-विनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥
>
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
>
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
>
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
अर्थ (संक्षेपमे)#
- ◆सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये — सभ मंगलक सर्वोत्तम मंगलमयी माता
- ◆शिवे — कल्याणस्वरूपिणी
- ◆सर्वार्थसाधिके — सभ शुभ काज सिद्धि करबा वाली
- ◆शरण्ये — शरण देबा वाली
- ◆त्र्यम्बके — तीन नेत्र वाली
- ◆गौरि — उज्ज्वल, पवित्र स्वरूप
- ◆नारायणि — नारायणक दिव्य शक्ति




After the story
Comments (0)
Sign in to share your thoughts on this article.