मिथिलाक लोकजीवनमे वर्ष भरि अनेक पर्व-त्योहार मनाओल जाइत अछि, मुदा किछु पर्व एहन होइत अछि जे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहि, बल्कि परिवारक भावनासँ सीधा जुड़ल रहैत अछि। भर्दुतिया एहनहि एक पर्व अछि। कार्तिक शुक्ल पक्षक द्वितीया तिथिक दिन मनाओल जाएवला ई पर्व मिथिलामे भाय-बहिनक प्रेम, स्नेह, सम्मान आ मंगलकामनाक प्रतीक मानल जाइत अछि।
दीपावलीक उत्सव समाप्त भेला बाद जखन घर-आँगनमे उत्सवक वातावरण रहैत अछि, तखन भर्दुतियाक तैयारी शुरू भऽ जाइत अछि। गाम-घरमे छोटसँ पैघ सभ लोक एहि पर्वक प्रतीक्षा करैत छथि। बहिन अपन भायक बाट जोहैत छथि आ भाय सेहो एहि दिन बहिनसँ तिलक लेबाक लेल उत्साहित रहैत छथि।
भर्दुतियाक शुरुआत केना भेल?#
भर्दुतियाक सम्बन्ध पुराणमे वर्णित यमराज आ यमुनाक कथा सँ जोड़ल जाइत अछि। मान्यता अनुसार सूर्य भगवानक पुत्र यमराज आ पुत्री यमुना छलथि। यमुना अपन भाय यमराजसँ बहुत स्नेह करैत छलीह। ओ बार-बार अपन भायकेँ घर आबय लेल निमन्त्रण दैत छलीह, मुदा यमराज अपन कार्यमे व्यस्त रहबाक कारण नहि आबि पबैत छलथि।
बहुत दिन बाद कार्तिक शुक्ल द्वितीयाक दिन यमराज यमुनाक घर पहुँचलाह। यमुना अत्यन्त प्रसन्न भेलीह। ओ अपन भायक स्वागत केलनि, भोजन करौलनि, तिलक लगौलनि आ हुनकर दीर्घ आयुक कामना केलनि।
बहिनक प्रेम आ आदरसँ प्रसन्न भऽ यमराज वरदान देलनि जे एहि दिन जे भाय अपन बहिनसँ तिलक ग्रहण करत, ओकर जीवन सुखमय रहत आ ओकरा यमलोकक भय कम रहत। ओहि दिनसँ भातृ द्वितीया अथवा भर्दुतियाक परम्परा प्रारम्भ भेल मानल जाइत अछि।
मिथिलामे भर्दुतियाक विशेष महत्व#
मिथिलामे भर्दुतिया केवल एक धार्मिक पर्व नहि अछि। ई भाय-बहिनक सम्बन्धकेँ मजबूत करबाक अवसर मानल जाइत अछि। विवाहक बाद बहिन ससुरालमे रहय लगैत छथि, मुदा भर्दुतिया एहन दिन होइत अछि जखन भाय-बहिन फेर एक-दोसराक संग समय बितबैत छथि।
गाममे बुजुर्ग लोक कहैत छथि जे जकर बहिन भर्दुतियाक तिलक करैत छथि, ओकर जीवनमे भगवानक कृपा बनल रहैत अछि। एहि कारणेँ एहि पर्वक भावनात्मक महत्व बहुत अधिक मानल जाइत अछि।
भोरसँ शुरू होइत अछि तैयारी#
भर्दुतियाक दिन बहिनसभ भोरमे उठैत छथि। स्नान-ध्यानक बाद घरक आँगन साफ कएल जाइत अछि। मिथिलाक बहुत घरमे आइयो गोबर आ माटिसँ आँगन निपबाक परम्परा जीवित अछि।
मान्यता अछि जे गोबरसँ निपल आँगन शुद्धता, पवित्रता आ मंगलक प्रतीक होइत अछि। आँगन साफ भेला बाद चाउरक पीठारसँ सुन्दर अरिपन बनाओल जाइत अछि।
अरिपन मिथिलाक सांस्कृतिक पहचान अछि। बिना अरिपनक भर्दुतिया अधूरा मानल जाइत अछि। अरिपनक बीचमे पिड़ी अथवा चौकी राखल जाइत अछि, जतय बादमे भायकेँ बैसाओल जाइत अछि।
कुम्हरक फूलक महत्व#
भर्दुतियाक पूजामे कुम्हर अर्थात् कोहड़ाक पीयर फूलक विशेष महत्व मानल जाइत अछि। मिथिलाक बहुत गाममे पूजाक थारीमे कुम्हरक फूल अवश्य राखल जाइत अछि।
लोकविश्वास अनुसार कुम्हरक बेल बहुत तेजी सँ बढ़ैत अछि। ओहि कारणेँ ई वृद्धि, उन्नति आ समृद्धिक प्रतीक मानल जाइत अछि। बहिन जखन भायक तिलक करैत छथि, तखन कुम्हरक फूलक प्रयोग कऽ भायक दीर्घ आयु आ उन्नतिक कामना करैत छथि।
पूजाक सामग्री#
भर्दुतियाक पूजाक थारीमे सामान्यतः निम्न सामग्री राखल जाइत अछि —
- ◆दही, अक्षत, पान, सुपारी
- ◆दीप, धूप, फूल
- ◆कुम्हरक पीयर फूल
- ◆मिठाई, मखान आ अन्य शुभ सामग्री
कतेको घरमे मौसमी फल, नारियल आ बताशा सेहो राखल जाइत अछि। पूजाक प्रत्येक सामग्रीक अपन धार्मिक आ सांस्कृतिक महत्व मानल जाइत अछि।
भायक आगमन#
जखन भाय बहिनक घर पहुँचैत छथि, तखन पूरा वातावरण खुशीसँ भरि जाइत अछि। बहिन अपन भायक स्वागत करैत छथि। कतेको घरमे आरती उतारबाक परम्परा सेहो रहैत अछि।
भायकेँ अरिपन पर राखल पिड़ी पर बैसाओल जाइत अछि। एहि समय घरक अन्य सदस्य सेहो उपस्थित रहैत छथि।
गंगा-यमुना लोकमन्त्र#
तिलकक समय मिथिलाक बहुत घरमे एकटा सुन्दर लोकमन्त्र कहल जाइत अछि —
"गंगा नोतै छैथ यमुना के,
हम नोतै छी अप्पन भाएकेँ।
जहिना जहिना गंगा-यमुना के धार बढ़ए,
तहिना हमर भाए सभहक अरुदा बढ़य।"
एहि लोकमन्त्रमे बहिन गंगा आ यमुनाक अविरल प्रवाहक समान भायक आयु, सुख, समृद्धि आ उन्नतिक कामना करैत छथि।
तिलकक विधि#
बहिन सभसँ पहिने भायक माथ पर दही-अक्षतक तिलक लगबैत छथि। तकर बाद फूल आ अक्षत अर्पित करैत छथि।
तिलकक समय बहिन भगवानसँ प्रार्थना करैत छथि जे हुनकर भाय स्वस्थ रहथि, दीर्घायु होथि आ जीवनमे सफलता प्राप्त करथि।
कतेको घरमे तिलकक बाद आरती उतारल जाइत अछि आ भगवान यमराज तथा यमुनाक स्मरण कएल जाइत अछि।
मिठाई आ प्रसाद#
तिलक सम्पन्न भेला बाद बहिन भायकेँ मिठाई खुवाबैत छथि। पेड़ा, खाजा, लाई, मखान, बताशा आ अन्य मिठाईक प्रयोग कएल जाइत अछि।
कतेको गाममे दही-चूड़ा अथवा विशेष घरेलू पकवान सेहो खिलाओल जाइत अछि।
उपहारक परम्परा#
तिलकक बाद भाय बहिनकेँ उपहार दैत छथि — वस्त्र, मिठाई, धनराशि अथवा अन्य उपहार।
मुदा लोकमान्यता अछि जे भर्दुतियामे उपहारक मूल्य नहि, बल्कि प्रेमक मूल्य अधिक होइत अछि। एहि कारणेँ छोट उपहार सेहो बहिन लेल अमूल्य मानल जाइत अछि।
भोजनक विशेष व्यवस्था#
भर्दुतियाक दिन घरमे विशेष भोजन तैयार कएल जाइत अछि — दाल, भात, तरकारी, चोखा, दही, मिठाई आ विभिन्न पारम्परिक व्यंजन।
बहुत बहिन अपन भायक पसन्दक भोजन बनबैत छथि। भोजनक समय पूरा परिवार एकठाम बैसैत अछि आ उत्सवक वातावरण बनल रहैत अछि।
गामक वातावरण#
गाममे भर्दुतियाक दिन अलग रौनक देखबाक लेल भेटैत अछि। कतेको घरमे बहिनसभ सवेरेसँ तैयारीमे लागल रहैत छथि। बच्चासभ नव कपड़ा पहिरैत छथि। घर-घरमे मिठाई बनैत अछि। लोक एक-दोसराक घर जा कऽ शुभकामना दैत छथि।
भाय-बहिनक सम्बन्धक पर्व#
भर्दुतियाक असली महत्व तिलक वा उपहारमे नहि, बल्कि भाय-बहिनक सम्बन्धमे अछि। बचपनक झगड़ा, हँसी, खेल, स्मृतिसभ एहि दिन फेरसँ जीवित भऽ जाइत अछि।
बहिन अपन भायक सुखक कामना करैत छथि, जबकि भाय बहिनक सम्मान आ सुरक्षा लेल सदैव तत्पर रहबाक संकल्प लैत छथि। मिथिलामे सामा-चकेवा आ भर्दुतिया — दुनू मिलिकऽ भाई-बहिनक स्नेहक उत्सवकेँ भारतक सबसँ सुन्दर परम्परासभमे सँ एक बना दैत अछि।
आधुनिक समयमे भर्दुतिया#
आइ बहुत लोक रोजगार, शिक्षा अथवा अन्य कारणसँ देश-विदेशमे रहैत छथि। मुदा भर्दुतियाक महत्व कम नहि भेल अछि।
जँ प्रत्यक्ष भेट सम्भव नहि होइत अछि, तँ फोन, वीडियो कॉल आ सन्देशक माध्यमसँ शुभकामना आदान-प्रदान कएल जाइत अछि। मुदा जखन भाय-बहिन प्रत्यक्ष भेटि तिलक करैत छथि, तखन एहि पर्वक आनन्द किछु आओर बढ़ि जाइत अछि।
निष्कर्ष#
भर्दुतिया मिथिलाक केवल एक पर्व नहि, बल्कि प्रेम, आस्था, सम्मान आ पारिवारिक सम्बन्धक उत्सव अछि। गोबरसँ निपल आँगन, सुन्दर अरिपन, कुम्हरक पीयर फूल, गंगा-यमुना लोकमन्त्र, दही-अक्षतक तिलक, मिठाई, उपहार आ भाय-बहिनक मुस्कान — ई सभ मिलिकऽ भर्दुतियाकेँ मिथिलाक सबसँ सुन्दर लोकपर्वसभमे सँ एक बना दैत अछि।
समय बदलैत रहत, जीवनशैली बदलैत रहत, मुदा भर्दुतियाक दिन बहिनक मनसँ निकलल ई प्रार्थना सदिखन जीवित रहत —
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"जहिना गंगा-यमुना के धार बढ़ैत रहय, तहिना हमर भायक आयु, सुख आ समृद्धि बढ़ैत रहय।"
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