तिला संक्रांति — मिथिलाक मकर संक्रांतिकें तिल-गुड़क मिठाईक आदान-प्रदान, पतंगबाजी, आ पवित्र नदी स्नानसँ मनाओल जाइत अछि। ई पर्व सूर्यक मकर राशिमे प्रवेशक अवसरपर मनाओल जाइत अछि, जे पौष मासमे पड़ैत अछि।
पौराणिक आ खगोलीय महत्व#
तिला संक्रांति सूर्यक उत्तरायण होबाक प्रतीक थिक — यानी सूर्यक उत्तरक दिस गमन। एहि दिनसँ दिन बढ़य लगैत अछि आ राति छोट होय लगैत अछि। मान्यता अछि जे उत्तरायणक समयमे शरीर त्यागब मोक्षदायी होइत अछि।
तिल-गुड़क परंपरा#
तिला संक्रांतिक दिन तिल आ गुड़सँ बनल मिठाई (तिलकोर) बनाओल आ खाओल जाइत अछि। तिल-गुड़क आदान-प्रदान संग "तिल-गुड़ खाउ, मिलजुलि रहू" जेकाँ शुभकामना देल जाइत अछि, जे संबंधकें मीठ रखबाक कामनाकें दर्शाबैत अछि।
स्नान आ दानक महत्व#
एहि दिन पवित्र नदीमे स्नान करब आ दान करब अत्यंत शुभ मानल जाइत अछि। मिथिलाक लोक गंगा वा अन्य पवित्र नदीमे स्नान क' तिल, गुड़, वस्त्र आ अन्नक दान करैत छथि, जे पुण्य-प्राप्तिक लेल कएल जाइत अछि।
पतंगबाजीक उत्सव#
तिला संक्रांतिक दिन आकाश रंग-बिरंगा पतंगसँ भरि जाइत अछि। बच्चा आ जवान सभ छतपर चढ़ि क' पतंग उड़बैत छथि, जे एहि पर्वकें एकटा उत्सवी रूप दैत अछि। ई परंपरा मिथिलाक अलावा भारतक अनेक क्षेत्रमे प्रचलित अछि।
कृषि आ मौसमी महत्व#
तिला संक्रांति फसल कटनीक मौसमसँ जुड़ल अछि। ई पर्व किसानकें अपन मेहनतक फलक आनंद उठेबाक अवसर दैत अछि, आ शीतकालीन फसलक कटनी बाद एकटा नव कृषि-चक्रक आरंभक संकेत सेहो थिक।
निष्कर्ष#
तिला संक्रांति मिथिलाक जीवित सांस्कृतिक धरोहरकें समृद्ध करैत अछि — ई पर्व खगोलीय परिवर्तन, कृषि आ सामाजिक मिठासकें एक साथ जोड़ैत अछि।
"तिल-गुड़क मिठासमे मिथिलाक नव वर्षक शुभारंभ बसैत अछि।"
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