अक्षय तृतीया वैशाख माहक शुक्ल पक्षक तृतीया तिथिकें मनाओल जाइत अछि। "अक्षय" शब्दक अर्थ थिक — जे कहियो क्षय नहि होइत, यानी जे सदिखन बढ़ैत रहैत अछि। मिथिलामे एहि दिनकें भगवान परशुरामक जन्मोत्सव आ हर प्रकारक शुभारंभक लेल सर्वाधिक शुभ तिथि मानल जाइत अछि।
परशुराम जयंती#
परशुराम भगवान विष्णुक छठम अवतार मानल जाइत छथि। कहल जाइत अछि जे ओ चिरंजीवी छथि — यानी आइयो कतहु जीवित छथि। मिथिलाक अनेक मंदिरमे एहि दिन विशेष पूजा-अर्चना होइत अछि आ परशुरामक कथा सुनाओल जाइत अछि। ई कथा शक्ति आ धर्मक संतुलनकें दर्शाबैत अछि — परशुराम अन्यायक विरुद्ध शस्त्र उठेलनि, मुदा हुनकर मूल स्वभाव तपस्वीक छल।
शुभारंभक परंपरा#
मिथिलामे मान्यता अछि जे अक्षय तृतीयाक दिन कोनो शुभ कार्य आरंभ करलासँ ओ कार्य अक्षय फल दैत अछि। एहि दिन बिना पंचांग देखने विवाह, गृहप्रवेश, नव व्यापार, भूमिपूजन जेकाँ शुभ कार्य कएल जा सकैत अछि, कियाकि ई तिथि स्वयं अबूझ (सर्वदा शुभ) मानल जाइत अछि। एहि कारण गामक बहुत रास सामूहिक विवाह आ नव गृहारंभ एही दिन होइत अछि।
दान आ पुण्यक महत्व#
अक्षय तृतीयाक दिन दान करबाक विशेष महत्व अछि। जल, अन्न, वस्त्र, स्वर्णक दानकें एहि दिन अक्षय पुण्य दैवला मानल जाइत अछि। मिथिलाक गाम-गाममे एहि दिन गरीब आ जरूरतमंदकें भोजन कराओल जाइत अछि, आ मंदिरमे जलक कलश दान कएल जाइत अछि — ग्रीष्म ऋतुक आरंभमे जलदानक विशेष महत्व अछि।
कृषि आ ग्रामीण जीवनसँ जुड़ाव#
अक्षय तृतीया कृषि-चक्रक दृष्टिएँ सेहो महत्वपूर्ण अछि। ई रबी फसलक कटनीक बाद आ खरीफक बीजारोपणसँ पहिनुक तिथि थिक। किसान एहि दिन नव बीज पूजा क' खेतीक शुभारंभ करैत छथि। मिथिलाक ग्रामीण क्षेत्रमे एहि दिनकें कृषि-वर्षक एकटा प्रकारक "नव वर्ष" जेकाँ सेहो देखल जाइत अछि।
साहित्य आ लोकपरंपरामे उल्लेख#
मान्यता अछि जे महर्षि वेदव्यास एही दिन गणेशजीकें महाभारत कथा लिखाबय आरंभ केलनि छलाह। मिथिलाक पंचांग-परंपरामे अक्षय तृतीयाक विशेष उल्लेख भेटैत अछि, आ पुरान पोथीमे एकर वर्णन शुभ मुहूर्तक "राजा" जेकाँ कएल गेल अछि।
निष्कर्ष#
अक्षय तृतीया मिथिलाक जीवित सांस्कृतिक धरोहरकें समृद्ध करैत अछि — ई पर्व शक्ति आ तपस्याक संतुलन, दानक महत्व, आ नव आरंभक शुभताकें एक साथ जोड़ैत अछि।
"अक्षय तृतीयाक शुभ घड़ी, हर आरंभकें अक्षय बनाबय।"
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